बाय-बाय रजत पाटीदार। अब टीम इंडिया में आपका चयन कभी नहीं होगा।

ऐसा कहने के पीछे मेरे पास मजबूत वजहें हैं और ये वजहें खुद रजत पाटीदार ने दी हैं।

पाटीदार को एशिया कप में इंडिया A का प्रतिनिधित्व करना था। वह टीम के उपकप्तान भी थे। जब चयनकर्ता किसी खिलाड़ी को यह जिम्मेदारी देते हैं, तो इसका मतलब है कि वह उनकी योजनाओं में शामिल है। इस टूर्नामेंट में उनके पास बड़े मंच पर खुद को साबित करने और सीनियर भारतीय टीम में चयन की दावेदारी मजबूत करने का मौका था।

उपकप्तान होने के नाते उन्हें लगातार मुकाबले खेलने के मौके मिलने की पूरी संभावना थी। उनके पास मंच भी था और जिम्मेदारी भी। लेकिन इसका फायदा उठाने के बजाय उन्होंने टीम से नाम वापस ले लिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें 50 ओवर के प्रारूप के लिए चयन में शामिल न किया जाए, क्योंकि वह अपनी चोट को मैनेज करना चाहते हैं।

रजत पाटीदार का नाम वापस लेना गलत संदेश क्यों देता है?

समस्या इस फैसले के समय को लेकर है।

पाटीदार रणजी ट्रॉफी खेल रहे हैं। उन्होंने हाल ही में ऑस्ट्रेलिया A के खिलाफ इंडिया A का प्रतिनिधित्व भी किया था, जिसमें 50 ओवर के मुकाबले शामिल थे। लगातार खेलने के बीच इस टूर्नामेंट से नाम वापस लेना उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।

इन मुकाबलों में खेलने से यह साबित नहीं होता कि उन्हें चोट नहीं है। लेकिन उन्होंने चयन का जो मौका छोड़ा है, वह साफ है। उन्हें टीम में जगह, नेतृत्व की जिम्मेदारी और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने का अवसर मिला था।

टीम इंडिया में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहे खिलाड़ी के लिए ऐसे मौके अहम होते हैं। घरेलू क्रिकेट का अच्छा प्रदर्शन किसी खिलाड़ी को चयन की दौड़ में लाता है। इंडिया A के मुकाबले उस दावेदारी को चयन में बदलने का एक और मंच देते हैं।

खतरा यह है कि चयनकर्ता उनके नाम वापस लेने को अपने भरोसे को ठुकराने के तौर पर देखें। अगर ऐसा हुआ, तो सवाल सीधा होगा: जिस खिलाड़ी ने पहले से मिले मौके के लिए खुद को अनुपलब्ध कर दिया, उसे बार-बार अवसर क्यों दिए जाएं?

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ईशान किशन का अनुभव एक चेतावनी है

ईशान किशन ने निजी कारणों का हवाला देते हुए दक्षिण अफ्रीका टेस्ट सीरीज से नाम वापस लिया था। रिपोर्ट्स में इसकी वजह मानसिक थकान बताई गई थी। इसके बाद घरेलू क्रिकेट से उनकी अनुपस्थिति एक अलग विवाद बनी और बाद में उन्हें BCCI का केंद्रीय अनुबंध भी गंवाना पड़ा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके नाम वापस लेने के बाद चयनकर्ताओं ने चयन संबंधी चर्चाओं में किशन के नाम पर विचार करना बंद कर दिया था। उनका भरोसा दोबारा जीतने और भारतीय टीम में लौटने में उन्हें करीब दो साल लगे।

लेकिन किशन के पास उम्र का फायदा था। पाटीदार पहले ही 33 साल के हो चुके हैं और उनके पास यह सहूलियत नहीं है। दो साल का एक और इंतजार उन्हें 35 साल की उम्र में टीम इंडिया में खुद को स्थापित करने की कोशिश तक पहुंचा देगा।

इस तुलना में सबसे बड़ी चिंता यही है। कोई खिलाड़ी रन बनाने के बावजूद अगले मौके के लिए लंबे समय तक इंतजार कर सकता है। इस बीच दूसरे खिलाड़ी टीम में आकर अपनी जगह मजबूत कर लेते हैं।

33 साल की उम्र में पाटीदार और समय नहीं गंवा सकते

अगर पाटीदार भारतीय टीम में खुद को स्थापित करना चाहते हैं, तो यह साल और अगला साल उनके लिए बेहद अहम हैं।

चयन के लिए उम्र की कोई आधिकारिक सीमा नहीं है, लेकिन प्रतिस्पर्धा भी रुकती नहीं है। युवा खिलाड़ी अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं और हर घरेलू सीजन के साथ चयनकर्ताओं के पास विकल्प बढ़ रहे हैं।

अगर पाटीदार को अब अपनी उपलब्धता को लेकर दोबारा भरोसा बनाना पड़ा, तो खतरा है कि वह पहले वाली स्थिति में लौटने की कोशिश में ही अपने बचे हुए मौके गंवा दें।

उनका चयन हो चुका था। उन्हें उपकप्तान बनाया गया था। एशिया कप में प्रदर्शन करके उनके पास खुद को साबित करने का मौका था।

ऐसी स्थिति से पीछे हटना उस खिलाड़ी के लिए महंगा दांव है, जो एक और लंबे इंतजार का जोखिम नहीं उठा सकता।

उनके T20 चयन की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं

50 ओवर का क्रिकेट खेलने से मना करने का मतलब यह नहीं है कि पाटीदार की T20 उम्मीदें अपने आप सुरक्षित रहेंगी।

अगर चयनकर्ता उनकी उपलब्धता को नकारात्मक नजरिए से देखते हैं, तो यह चिंता दूसरे प्रारूपों की योजनाओं में भी शामिल हो सकती है। वे उन खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने का फैसला कर सकते हैं, जो दिए गए मौकों के लिए उपलब्ध हों।

इसी वजह से इस फैसले का असर केवल एक टूर्नामेंट छोड़ने तक सीमित नहीं है। पाटीदार ने बाद में एक और मौका मिलने की उम्मीद में अभी उपलब्ध अवसर छोड़ दिया है।

उनका भारतीय करियर खत्म हो सकने की आशंका इन्हीं बातों पर टिकी है: एक मौका गंवाना, चयनकर्ताओं का भरोसा खोने का जोखिम और अपनी दावेदारी दोबारा मजबूत करने के लिए सीमित समय।

33 साल की उम्र में पाटीदार यह मानकर नहीं चल सकते कि वह तय करते रहेंगे कि कौन-सा मौका स्वीकार करना है और उनके लिए दरवाजा खुला रहेगा।

बाय-बाय रजत पाटीदार।

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