कागज पर भारत ने सीरीज 3-2 से जीत ली है। स्कोरलाइन साफ यही बता रही है। लेकिन एक क्रिकेट फैन की तरह इस सीरीज को करीब से देखिए, तो यह दमदार प्रदर्शन के दम पर हासिल की गई जीत नहीं लगती।
भारतीय फैंस खुश हो सकते हैं कि आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज हारने के बाद टीम ने आखिरकार किसी SENA देश में सीरीज जीती। लेकिन जब भारत ने अपनी कमियां दूर ही नहीं की हैं, तो इतना खुश होने की वजह भी नहीं है।
भाग्य और न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों का साथ नहीं मिला होता, तो भारत यह सीरीज 3-2 या यहां तक कि 4-1 से भी हार सकता था। आइए समझते हैं क्यों।
न्यूजीलैंड ने दो मुकाबले एकतरफा जीते, भारत ने सिर्फ एक
न्यूजीलैंड की आखिरी दो मैचों की जीत देखिए। दोनों मुकाबले एकतरफा रहे। किसी भी मैच में भारत गंभीरता से मुकाबले में नजर नहीं आया।
अब भारत की जीतों को देखिए। शुरुआती दोनों मुकाबले बेहद तनावपूर्ण थे और नतीजे आखिरी ओवर में आए। कई मौके ऐसे आए जब लगा कि न्यूजीलैंड जीत जाएगा। दोनों मैच बेहद करीबी रहे।
भारत की तीसरी जीत एकतरफा थी, जिसमें न्यूजीलैंड कभी मुकाबले में नजर नहीं आया।
यानी न्यूजीलैंड ने दो मुकाबले आसानी से जीते, जबकि भारत ने सिर्फ एक। बाकी दोनों मैच किसी भी तरफ जा सकते थे। बेशक, जीत तो जीत होती है और भारत ने सीरीज 3-2 से अपने नाम की। लेकिन सिर्फ इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि सीरीज जीती कैसे गई।
15 छोड़े गए कैचों ने भारत को बार-बार मौके दिए
सबसे महत्वपूर्ण बात न्यूजीलैंड की कैचिंग है। उन्होंने पांच मैचों में 15 कैच छोड़े। यानी हर मुकाबले में औसतन तीन कैच।
अगर विपक्षी टीम हर मैच में तीन कैच छोड़ रही है, तो क्या भारत को सिर्फ 3-2 से सीरीज जीतकर संतुष्ट होना चाहिए? इतनी मदद मिलने पर जीत का अंतर कहीं बेहतर होना चाहिए था। भारत को पांचों मैच जीतने की ओर देखना चाहिए था।
हर छूटे हुए कैच ने किसी भारतीय बल्लेबाज को क्रीज पर टिके रहने और रन बनाने का एक और मौका दिया। इतने अतिरिक्त मौके मिलना बहुत बड़ा फायदा है। सामान्य तौर पर किसी टीम को पूरी सीरीज में इतनी मदद नहीं मिलती।
इसमें वे दो विकेट भी जोड़ लीजिए, जो न्यूजीलैंड ने नो-बॉल पर लिए थे। इससे भारत को और जीवनदान मिले। न्यूजीलैंड ने बल्लेबाजों को आउट करने के मौके बनाए और फिर खुद ही उन्हें गंवा दिया।
भारत की 3-2 की जीत में न्यूजीलैंड की खराब फील्डिंग का बड़ा योगदान रहा। अगर उन्होंने ये मौके भुनाए होते, तो भारत आसानी से एक और मैच तथा सीरीज हार सकता था।
टॉस में भाग्य और ओस ने भी भारत का साथ दिया
टॉस में भी भाग्य भारत के साथ रहा। न्यूजीलैंड शुरुआती चारों मुकाबलों में टॉस हारा और उसे हर बार दूसरी पारी में गेंदबाजी करनी पड़ी।
ये मुकाबले न्यूजीलैंड में देर रात तक खेले जा रहे थे, ताकि भारतीय दर्शक सुविधाजनक समय पर देख सकें। देर रात तक चलने वाले इन मैचों में चिंता ओस और उससे दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने वाली टीम को मिलने वाले अतिरिक्त फायदे की थी।
ज्यादा ओस होने पर गेंद को पकड़ना मुश्किल हो जाता है। गेंदबाज अपनी गेंदों पर नियंत्रण खोने लगते हैं और सही लाइन-लेंथ बनाए रखना कहीं कठिन हो जाता है।
आखिरी मुकाबला देखिए। न्यूजीलैंड ने दूसरी पारी में बल्लेबाजी की और आसानी से जीत हासिल की। शुरुआती दौर के बाद भारतीय गेंदबाज ग्रिप और नियंत्रण के लिए जूझते दिखे। गेंद पर सही नियंत्रण नहीं होने के कारण उनकी लाइन-लेंथ भी बिगड़ी।
शुरुआती चारों टॉस जीतने से भारतीय गेंदबाजों को पहली पारी में उपलब्ध मूवमेंट का इस्तेमाल करने का मौका बार-बार मिला। न्यूजीलैंड को इसके बाद लक्ष्य बचाना पड़ा और जब ओस ने गेंद को प्रभावित किया, तो बाद के ओवरों में गेंदबाजी खास तौर पर मुश्किल हुई।
यह बात शुरुआती दो मुकाबलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। न्यूजीलैंड जीतने की स्थिति में था, लेकिन आखिरी 10 ओवरों में दोनों मैच गंवा बैठा। तर्क यह है कि जिस समय मुकाबले उनके हाथ से निकले, उसी समय ओस ने उनके गेंदबाजों के लिए नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल कर दिया।
गीली गेंद फील्डिंग की गलतियों में भी योगदान दे सकती है। मिसफील्ड और छूटे हुए मौके लक्ष्य का पीछा करने वाली टीम की और मदद करते हैं। इससे स्कोर बचाना ज्यादा कठिन हो जाता है।
इस प्रदर्शन पर भारत के पास गर्व करने की खास वजह नहीं
सिर्फ स्कोरलाइन के बजाय क्रिकेट को परखिए, तो भारत का प्रदर्शन इतना अच्छा नहीं था कि इस स्तर का जश्न मनाया जाए।
न्यूजीलैंड के फील्डरों ने भारत को बार-बार मौके दिए। शुरुआती चारों टॉस जीतना भी भारत के पक्ष में गया। इन फायदों के बिना यह सीरीज न्यूजीलैंड के नाम हो सकती थी।
ट्रॉफी भारत के पास है, लेकिन कमियां बनी हुई हैं। इतनी मदद मिलने के बाद 3-2 की जीत हासिल करना कोई गर्व करने वाला प्रदर्शन नहीं है।
